
नई दिल्ली: संसद के मॉनसून सत्र का अंतिम सप्ताह आज से शुरू हो रहा है और इसके साथ ही सत्ता पक्ष एवं विपक्ष के बीच एक बार फिर तीखे राजनीतिक टकराव के आसार बन गए हैं। सत्र के अंतिम तीन दिनों में कई ऐसे महत्वपूर्ण और विवादित विधेयकों पर चर्चा और उन्हें पारित कराने की संभावना है, जो पहले से ही देश की राजनीति और वैचारिक बहस के केंद्र में रहे हैं।
इस स्थिति की गंभीरता को देखते हुए मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने अपने सभी सांसदों को तीन-पंक्ति का व्हिप जारी कर सदन में अनिवार्य रूप से उपस्थित रहने का निर्देश दिया है। इसके साथ ही ‘इंडिया’ (INDIA) गठबंधन के सभी सहयोगी दलों से भी सत्र के दौरान शत-प्रतिशत उपस्थिति सुनिश्चित करने का आग्रह किया गया है।
विवादित विधेयकों पर टिकी नजरें
सदन के पटल पर रखे जाने वाले विधेयकों में सबसे ज्यादा चर्चा विदेशी चंदे के नियमों में बदलाव यानी ‘फॉरेन कंट्रीब्यूशन रेगुलेशन एक्ट’ (FCRA) से जुड़े बिल की है। इस बिल को लेकर न केवल घरेलू स्तर पर बल्कि अमेरिका तक में विरोध की आवाजें उठी हैं। आलोचकों का तर्क है कि ये नए नियम गैर-सरकारी संगठनों और अंतरराष्ट्रीय नागरिक संस्थाओं के कामकाज को सीधे तौर पर प्रभावित करेंगे।
इसके अलावा केंद्र सरकार अंतिम तीन दिनों में कई अन्य बड़े एजेंडों को आगे बढ़ाना चाहती है:
* **उच्च शिक्षा क्षेत्र का पुनर्गठन:** देश की उच्च शिक्षा व्यवस्था और नियमन में व्यापक बदलाव से जुड़ा विधेयक।
* **’वंदे मातरम्’ को कानूनी संरक्षण:** राष्ट्रीय गीत के सम्मान और उसे कानूनी संरक्षण देने से संबंधित प्रस्ताव।
* **ट्रिब्यूनल सुधार:** विभिन्न न्यायाधिकरणों और प्राधिकरणों की संरचना और कार्यप्रणाली में बदलाव का बिल।
विपक्षी दल इन सभी प्रस्तावों पर पहले से ही सवाल उठाते रहे हैं और इन्हें सरकार का एकतरफा वैचारिक एजेंडा करार दे रहे हैं।
‘बिना चर्चा बिल पास’ बनाम ‘हंगामे की राजनीति’
संसदीय कार्यप्रणाली को लेकर इस सत्र में शुरुआत से ही खींचतान देखी गई है। 20 जुलाई से 7 अगस्त के बीच संसद के निचले सदन (लोकसभा) में छह बिल और ऊपरी सदन (राज्यसभा) में दो बिल पारित हो चुके हैं।
विपक्ष का सीधा आरोप है कि सरकार लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं की अनदेखी कर बिना किसी विस्तृत चर्चा के महज कुछ ही मिनटों में महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित करा रही है। वहीं, सरकार का कहना है कि विपक्ष गंभीर विषयों पर चर्चा में भाग लेने के बजाय केवल हंगामे की राजनीति कर रहा है और विधायी कार्यों में बाधा डाल रहा है।
विशेषज्ञों का विश्लेषण: अटूट तेवर और नब्ज़ टटोलने की रणनीति
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मॉनसून सत्र का यह आखिरी दौर रणनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील है।
“सरकार जिस तरीके से पिछले दो हफ्तों में बिना चर्चा कराए मिनटों में बिल पास करा चुकी है और अगले तीन दिनों में जो बिल पास कराना चाहती है, उससे साफ समझ आता है कि वे अपने रुख में कोई बदलाव नहीं ला रहे हैं। ऐसा लगता है कि हाल ही में हुए युवा आंदोलन के बाद भी सरकार ने अपने तेवर न बदलने की ठान ली है। यही वजह है कि यह गतिरोध (standoff) सदन में आगे भी बना रहेगा।”
हेमंत अत्री, पूर्व राष्ट्रीय राजनीतिक संपादक (भास्कर समूह)**
दूसरी ओर, सरकार की इस रणनीति को राजनीतिक माहौल को भांपने के प्रयास के रूप में भी देखा जा रहा है।
“एफसीआरए और वंदे मातरम के सम्मान जैसे बिलों को सदन में पेश करके मोदी सरकार एक बार फिर नब्ज़ टटोलने की कोशिश करेगी। यह वैसा ही है जैसे कोई पानी में पत्थर मारकर प्रतिक्रिया देखना चाहता है। सरकार ऐसे ही समय-समय पर अपने राजनीतिक और वैचारिक एजेंडे से जुड़े विधेयकों को संसद में रखकर रुख आजमाने की कोशिश करती है।”
शरद गुप्ता, राजनीतिक विशेषज्ञ**
आगे क्या?
सत्र के अंतिम तीन दिन विधायी और राजनीतिक दोनों दृष्टिकोणों से निर्णायक साबित होने वाले हैं। एक तरफ जहां सरकार अपने प्रमुख एजेंडों को कानून का रूप देने के लिए पूरी ताकत झोंकेगी, वहीं गोलबंद हो चुका विपक्ष सदन में भारी उपस्थिति दर्ज कराकर इन विधेयकों को रोकने या उन्हें संसदीय समीक्षा समितियों के पास भेजने की मांग पर अड़ा रहेगा। इस खींचतान के बीच संसद के भीतर तीखे हंगामे और राजनीतिक घमासान का होना तय है।
