
नई दिल्ली:
संसद के उच्च सदन राज्यसभा में एक बार फिर राजनीतिक माहौल गरमा गया है। सदन में चर्चा के दौरान विपक्षी दलों द्वारा किए गए वॉकआउट (Walkout) पर सत्ता पक्ष ने कड़ा रुख अपनाया है। भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के राष्ट्रीय अध्यक्ष और राज्यसभा में सदन के नेता जेपी नड्डा ने विपक्ष के इस कदम की तीखी आलोचना करते हुए उनके रवैये को ‘गैर-जिम्मेदाराना’ करार दिया है। जेपी नड्डा ने कहा कि लोकतंत्र में बहस और संवाद ही सबसे बड़ा हथियार होता है, लेकिन विपक्ष चर्चा से भागकर केवल राजनीतिक ड्रामा करने में रुचि रखता है।
क्या है पूरा मामला?
संसद सत्र के दौरान जब एक महत्वपूर्ण मुद्दे पर चर्चा चल रही थी, तब विपक्षी सदस्यों ने नारेबाजी शुरू कर दी। विपक्ष किसी विशेष विषय पर तत्काल चर्चा कराने और प्रधानमंत्री की मौजूदगी की मांग कर रहा था। सभापति द्वारा बार-बार शांति बनाए रखने और अपनी बात नियमानुसार रखने की अपील के बावजूद विपक्षी सांसदों का हंगामा जारी रहा। आखिरकार, अपनी मांगों को लेकर संतोषजनक जवाब न मिलने का आरोप लगाते हुए कांग्रेस समेत तमाम विपक्षी दलों के सांसदों ने सदन से वॉकआउट कर दिया।
‘विपक्ष के पास न मुद्दे हैं, न तर्क’: जेपी नड्डा
विपक्ष के सदन से बाहर जाने के तुरंत बाद जेपी नड्डा ने सदन को संबोधित करते हुए विपक्षी दलों पर करारा हमला बोला। नड्डा ने कहा, *”सदन देश की जनता की समस्याओं को उठाने और उन पर ठोस नीति बनाने की जगह है। लेकिन दुर्भाग्य से, आज का विपक्ष संसद की गरिमा को समझने में पूरी तरह नाकाम साबित हुआ है। विपक्ष का यह रवैया न केवल गैर-जिम्मेदाराना है, बल्कि यह देश की जनता के जनादेश का भी अपमान है।”*
उन्होंने आगे कहा कि जब भी सरकार किसी राष्ट्रीय महत्व के मुद्दे पर तथ्य और आंकड़े पेश करने के लिए तैयार होती है, विपक्ष के पास सुनने का धैर्य नहीं होता। नड्डा ने आरोप लगाया कि विपक्ष केवल हेडलाइंस बनाने और सोशल मीडिया पर भ्रम फैलाने के लिए सदन का समय बर्बाद करता है।
सदन का समय और जनता के पैसे की बर्बादी
जेपी नड्डा ने अपने संबोधन में संसद के संचालन में होने वाले खर्च और जनता के समय का हवाला भी दिया। उन्होंने कहा कि संसद का हर एक मिनट देश के करदाताओं (Taxpayers) के पैसे से चलता है। जनता अपने प्रतिनिधियों को इसलिए चुनकर भेजती है ताकि वे उनकी समस्याओं को पटल पर रख सकें और देश के विकास में भागीदारी निभाएं। लेकिन विपक्षी दल बार-बार वॉकआउट करके देश के संसाधनों और समय की बर्बादी कर रहे हैं।
संसदीय मर्यादा और लोकतंत्र पर उठते सवाल
संसद में गतिरोध और वॉकआउट की घटनाएं कोई नई नहीं हैं, लेकिन हाल के समय में जिस तरह से हर मुद्दे पर सदन का बहिष्कार करने की प्रवृत्ति बढ़ी है, उसने राजनीतिक विश्लेषकों को भी सोचने पर मजबूर कर दिया है।
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि:
संवाद की कमी: लोकतंत्र में असहमति स्वाभाविक है, लेकिन विरोध दर्ज कराने का सही तरीका सदन के भीतर बहस करना होता है, न कि मैदान छोड़कर भाग जाना।
*जनता के मुद्दों पर असर: वॉकआउट के कारण कई महत्वपूर्ण विधेयक बिना विस्तृत चर्चा के पास हो जाते हैं या फिर अटके रह जाते हैं, जिसका सीधा असर देश की नीतियों पर पड़ता है।
सत्ता पक्ष का रुख: ‘हम हर सवाल का जवाब देने को तैयार’
जेपी नड्डा ने स्पष्ट किया कि सरकार किसी भी विषय पर सकारात्मक और स्वस्थ चर्चा से पीछे नहीं हट रही है। सरकार विपक्ष के हर तीखे सवाल का तथ्यात्मक जवाब देने के लिए पूरी तरह सक्षम और तैयार है। लेकिन इसके लिए जरूरी है कि विपक्ष सदन की प्रक्रिया का पालन करे और सरकार की बात सुनने का साहस दिखाए।
उन्होंने अंत में कहा कि देश की जनता सब देख रही है कि कौन से दल देशहित में काम कर रहे हैं और कौन केवल संसद की कार्यवाही में बाधा डालने का काम कर रहे हैं। आने वाले समय में जनता ही विपक्ष के इस गैर-जिम्मेदाराना रवैये का जवाब देगी।
निष्कर्ष
राज्यसभा में हुआ यह हालिया घटनाक्रम एक बार फिर यह सवाल खड़ा करता है कि क्या संसदीय लोकतंत्र में ‘वॉकआउट’ विरोध जताने का एक कारगर तरीका बचा है या फिर यह केवल जिम्मेदारी से बचने का जरिया बन चुका है? जेपी नड्डा के तीखे बयानों से साफ है कि सरकार इस मुद्दे पर विपक्ष को बख्शने के मूड में नहीं है और वह इसे जनता के बीच एक बड़े राजनीतिक मुद्दे के रूप में ले जाने की तैयारी में है।
