
अमेरिका में रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर 100% टैरिफ लगाने की संभावित व्यवस्था को लेकर भारत में सियासी बहस तेज हो गई है। अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में आगे बढ़े रूस प्रतिबंध विधेयक में भारत समेत कुछ देशों पर भारी टैरिफ लगाने का प्रावधान शामिल है। इसी मुद्दे को लेकर कांग्रेस अध्यक्ष और राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खरगे ने केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार पर निशाना साधा है। खरगे ने सरकार की विदेश और आर्थिक नीतियों पर सवाल उठाते हुए इसे भारत के हितों से जोड़कर देखा है।
100% टैरिफ का मुद्दा क्यों गरमाया?
अमेरिका में रूस के खिलाफ प्रतिबंधों को और कड़ा करने से जुड़ा एक विधेयक आगे बढ़ रहा है। इसमें अमेरिकी राष्ट्रपति को उन देशों पर 100% तक अतिरिक्त टैरिफ लगाने का अधिकार देने का प्रस्ताव है, जो रूस से तेल और गैस की खरीद जारी रखते हैं। भारत और चीन जैसे देश इस प्रस्ताव के दायरे में आ सकते हैं।
हालांकि, यह समझना जरूरी है कि 100% टैरिफ अभी भारत पर लागू नहीं हुआ है। अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में विधेयक की प्रक्रिया आगे बढ़ी है और इसे अंतिम रूप मिलने के बाद ही आगे की स्थिति स्पष्ट होगी। रिपोर्टों के मुताबिक, इस प्रस्ताव पर अमेरिकी संसद में अलग-अलग संशोधनों को लेकर भी चर्चा चल रही है।
खरगे ने मोदी सरकार पर साधा निशाना
इसी घटनाक्रम के बीच खरगे ने केंद्र सरकार की नीतियों को लेकर सवाल उठाए हैं। कांग्रेस लगातार यह तर्क देती रही है कि अमेरिका के साथ व्यापार और कूटनीतिक संबंधों को संभालने में सरकार को ज्यादा प्रभावी रणनीति अपनानी चाहिए।
खरगे का हमला ऐसे समय में आया है जब भारत पहले से ही अमेरिकी व्यापार नीतियों और टैरिफ से जुड़े दबाव का सामना कर रहा है। कांग्रेस का कहना है कि अगर अमेरिका की ओर से भारत पर अतिरिक्त शुल्क लगाया जाता है तो इसका असर देश के निर्यातकों, उद्योगों और रोजगार पर पड़ सकता है।
हालांकि, खरगे और कांग्रेस की ओर से लगाए गए राजनीतिक आरोपों को विपक्ष का नजरिया माना जाना चाहिए। केंद्र सरकार की ओर से अलग-अलग मौकों पर अमेरिका के साथ व्यापार और रणनीतिक संबंधों को लेकर अपने पक्ष और बातचीत की स्थिति स्पष्ट की गई है।
रूस से तेल खरीदना बना मुख्य मुद्दा
पूरे विवाद के केंद्र में भारत की रूसी तेल खरीद है। यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी देशों ने रूस पर कई आर्थिक प्रतिबंध लगाए हैं। इसके बावजूद भारत ने रूस से तेल खरीद जारी रखी है। भारत की ओर से ऊर्जा सुरक्षा और देश की बड़ी ऊर्जा जरूरतों को इसके पीछे प्रमुख कारणों में बताया जाता रहा है।
हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की मुलाकात भी हुई। दोनों देशों ने ऊर्जा, व्यापार और रणनीतिक सहयोग को आगे बढ़ाने पर जोर दिया। Reuters के अनुसार, भारत रूस से तेल खरीद को अपनी ऊर्जा सुरक्षा से जोड़ता है, जबकि दोनों देशों ने 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को बढ़ाने का लक्ष्य भी दोहराया है।
यही नीति अमेरिका के साथ भारत के संबंधों में एक महत्वपूर्ण चुनौती बन रही है। अमेरिका रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाने की कोशिश कर रहा है और रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर अतिरिक्त कार्रवाई की संभावना इसी रणनीति का हिस्सा है।
पहले भी टैरिफ को लेकर खरगे कर चुके हैं हमला
टैरिफ के मुद्दे पर खरगे इससे पहले भी मोदी सरकार पर निशाना साध चुके हैं। अगस्त 2025 में अमेरिका की ओर से भारत पर 50% टैरिफ लागू किए जाने के बाद खरगे ने सरकार की विदेश नीति पर सवाल उठाए थे। उन्होंने दावा किया था कि इससे कई प्रमुख क्षेत्रों पर आर्थिक दबाव बढ़ेगा और किसानों समेत निर्यात से जुड़े वर्ग प्रभावित हो सकते हैं।
अब 100% तक टैरिफ लगाने की संभावित व्यवस्था सामने आने के बाद कांग्रेस ने एक बार फिर सरकार की रणनीति पर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं।
सरकार की ओर से क्या स्थिति है?
केंद्र सरकार का पक्ष यह रहा है कि भारत अपने व्यापारिक और रणनीतिक हितों को ध्यान में रखते हुए विभिन्न देशों के साथ बातचीत करता है। अमेरिकी व्यापार नीतियों को लेकर भारत और अमेरिका के बीच लगातार बातचीत भी होती रही है।
जुलाई 2026 में वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय ने बताया था कि अमेरिका की Section 301 जांच के अंतिम उपायों के तहत भारत को 10% अतिरिक्त शुल्क वाली निचली श्रेणी में रखा गया। मंत्रालय ने कहा था कि भारत सरकार ने इस प्रक्रिया के दौरान अमेरिकी अधिकारियों के साथ लगातार बातचीत और परामर्श किया था।
इससे साफ है कि भारत और अमेरिका के बीच व्यापार से जुड़े कई अलग-अलग मुद्दे हैं और हर टैरिफ प्रस्ताव की अपनी अलग कानूनी एवं आर्थिक प्रक्रिया है।
भारतीय अर्थव्यवस्था पर क्या पड़ सकता है असर?
यदि भविष्य में भारत के खिलाफ वास्तव में 100% अतिरिक्त टैरिफ लगाया जाता है, तो इसका असर भारतीय निर्यात पर पड़ सकता है। अमेरिका भारतीय उत्पादों के प्रमुख बाजारों में शामिल है। ऐसे में अतिरिक्त शुल्क से अमेरिकी बाजार में भारतीय सामान की कीमत बढ़ सकती है और कुछ क्षेत्रों की प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति प्रभावित हो सकती है।
इसके अलावा कपड़ा, इंजीनियरिंग उत्पाद, रत्न एवं आभूषण, दवा और अन्य निर्यात-आधारित क्षेत्रों पर भी संभावित असर को लेकर चर्चा हो सकती है। हालांकि, वास्तविक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि टैरिफ किन उत्पादों पर लगाया जाता है, उसकी दर क्या रहती है और भारत-अमेरिका के बीच आगे क्या व्यापारिक समझौते होते हैं।
फिलहाल क्या है तस्वीर?
फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि 100% टैरिफ का खतरा एक प्रस्तावित अमेरिकी कानूनी व्यवस्था से जुड़ा है, न कि भारत पर लागू हो चुके किसी नए 100% शुल्क से। अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में संबंधित विधेयक आगे बढ़ा है और इसके बाद की संसदीय प्रक्रिया महत्वपूर्ण होगी।
इसी बीच कांग्रेस इस मुद्दे को केंद्र सरकार की विदेश नीति और आर्थिक रणनीति पर सवाल उठाने के लिए इस्तेमाल कर रही है। दूसरी ओर, भारत के लिए चुनौती यह है कि रूस से ऊर्जा संबंधों को बनाए रखते हुए अमेरिका के साथ व्यापारिक और रणनीतिक रिश्तों को भी संतुलित रखा जाए।
आने वाले दिनों में अमेरिकी संसद में विधेयक की आगे की प्रक्रिया और भारत-अमेरिका के बीच होने वाली बातचीत से स्थिति और स्पष्ट हो सकती है। फिलहाल 100% टैरिफ का मुद्दा भारत की विदेश नीति, ऊर्जा सुरक्षा और व्यापारिक हितों से जुड़ी बहस का प्रमुख विषय बना हुआ है।
