
ईरान की बड़ी चेतावनी, हिंद महासागर तक फैल सकता है युद्ध
अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव के बीच तेहरान की ओर से एक बड़ी चेतावनी सामने आई है। ईरान के सुप्रीम लीडर के सलाहकार मेजर जनरल याह्या रहीम सफवी ने कहा है कि अगर अमेरिका या इजरायल की ओर से दोबारा हमला किया जाता है, तो युद्ध का दायरा और बढ़ सकता है और यह हिंद महासागर तक पहुंच सकता है। सफवी ने 24 सितंबर को यह चेतावनी दी थी। उनके बयान के मुताबिक, संघर्ष पहले ही फारस की खाड़ी और स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज से आगे लाल सागर तक फैल चुका है और आगे इसका विस्तार हिंद महासागर तक हो सकता है।
भारत और चीन के लिए क्यों बढ़ सकती है चिंता?
ईरान की इस चेतावनी का असर पश्चिम एशिया से बाहर भी महसूस किया जा सकता है। भारत और चीन पश्चिम एशिया से आने वाले ऊर्जा संसाधनों के बड़े खरीदार हैं और इनके लिए समुद्री रास्ते बेहद महत्वपूर्ण हैं। अगर संघर्ष का दायरा बढ़ता है और हिंद महासागर में व्यापारिक जहाजों के लिए सुरक्षा जोखिम बढ़ते हैं, तो तेल और गैस की सप्लाई प्रभावित होने की आशंका बढ़ सकती है।
किसी बड़े समुद्री संकट की स्थिति में शिपिंग कंपनियां जोखिम वाले इलाकों से दूरी बना सकती हैं या वैकल्पिक रास्तों का इस्तेमाल कर सकती हैं। इससे जहाजों की यात्रा लंबी हो सकती है और फ्रेट, बीमा तथा ईंधन लागत में बढ़ोतरी हो सकती है। हालांकि, ईरान की ओर से अभी किसी विशेष भारतीय या चीनी तेल टैंकर को निशाना बनाने की घोषणा नहीं की गई है।
हॉर्मुज में पहले ही घट चुकी है जहाजों की आवाजाही
ईरान और अमेरिका के बीच तनाव का सबसे बड़ा असर स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज पर दिखाई दे रहा है। यह दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा समुद्री मार्गों में से एक है। Reuters के अनुसार, 21 सितंबर को प्रारंभिक शिपिंग डेटा में हॉर्मुज से सिर्फ दो कमोडिटी जहाजों के गुजरने की जानकारी सामने आई थी। संघर्ष से पहले इस रास्ते से औसतन करीब 125 बड़े व्यावसायिक जहाज प्रतिदिन गुजरते थे।
Reuters की एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार, सप्ताहांत में हॉर्मुज से 17 कमोडिटी जहाज गुजरे, जबकि उससे पिछले सप्ताह यह संख्या 37 थी। इसका मतलब है कि समुद्री यातायात में भारी गिरावट आई है, हालांकि कुछ तेल टैंकर ट्रांसपोंडर बंद करके भी आवाजाही कर रहे हैं।
दो जहाजों पर हमले की भी खबर
हॉर्मुज में सिर्फ यातायात ही प्रभावित नहीं हुआ है, बल्कि व्यावसायिक जहाजों की सुरक्षा को लेकर भी चिंता बढ़ी है। Reuters ने 22 सितंबर की रिपोर्ट में बताया कि दो अलग-अलग जहाजों पर हमले की सूचना मिली। एक क्रूड ऑयल टैंकर को अज्ञात प्रोजेक्टाइल से नुकसान पहुंचा और चालक दल के दो सदस्य मामूली रूप से घायल हुए। एक LPG टैंकर भी हॉर्मुज से निकलते समय हमले की चपेट में आया। इन हमलों के लिए जिम्मेदारी तत्काल स्पष्ट नहीं हुई थी।
इस तरह की घटनाओं से शिपिंग कंपनियों के लिए जोखिम बढ़ता है और इसका असर समुद्री बीमा तथा माल ढुलाई की लागत पर पड़ सकता है।
लाल सागर और बाब-अल-मंदेब भी अहम
हॉर्मुज के साथ लाल सागर और बाब-अल-मंदेब भी वैश्विक व्यापार के लिए महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग हैं। ईरान के सहयोगी हूती समूह की गतिविधियों के कारण इस क्षेत्र में पहले भी व्यापारिक जहाजों को सुरक्षा चुनौतियों का सामना करना पड़ा है।
Reuters के मुताबिक, बाब-अल-मंदेब से जहाजों की आवाजाही हॉर्मुज की तुलना में जारी रही है, लेकिन वहां भी पिछले सप्ताहांत की तुलना में ट्रैफिक में गिरावट दर्ज की गई। ऐसे में अगर संघर्ष का विस्तार इन समुद्री मार्गों तक और बढ़ता है तो एशिया, यूरोप और मध्य पूर्व के बीच व्यापारिक आपूर्ति श्रृंखला पर असर पड़ सकता है।
तेल की कीमतों पर भी पड़ सकता है असर
सबसे बड़ी चिंता कच्चे तेल की सप्लाई को लेकर है। हॉर्मुज ऐसा समुद्री मार्ग है जिससे संघर्ष से पहले वैश्विक तेल और LNG का बड़ा हिस्सा गुजरता था। Reuters के मुताबिक, युद्ध शुरू होने से पहले इस मार्ग से दुनिया के करीब एक-पांचवें तेल और LNG की आवाजाही होती थी।
अगर समुद्री मार्ग लंबे समय तक बाधित रहते हैं, तो बाजार में सप्लाई को लेकर चिंता बढ़ सकती है। इससे कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव बढ़ सकता है। भारत जैसे बड़े तेल आयातक देश के लिए इसका असर पेट्रोल-डीजल, परिवहन लागत और महंगाई पर पड़ सकता है।
चीन के लिए भी यह स्थिति महत्वपूर्ण है क्योंकि वह पश्चिम एशिया से बड़ी मात्रा में ऊर्जा आयात करता है। इसलिए लंबे समय तक समुद्री व्यवधान होने पर दोनों एशियाई अर्थव्यवस्थाओं को अतिरिक्त शिपिंग और ऊर्जा लागत का सामना करना पड़ सकता है।
क्या हिंद महासागर में फंसेंगे तेल टैंकर?
ईरान की चेतावनी के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या भारत और चीन आने वाले तेल टैंकरों को परेशानी का सामना करना पड़ेगा। फिलहाल इसका निश्चित जवाब नहीं है। ईरानी अधिकारी ने संभावित रूप से युद्ध का दायरा हिंद महासागर तक बढ़ने की बात कही है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि सभी व्यापारिक जहाजों की आवाजाही तुरंत बंद हो जाएगी।
अगर सैन्य गतिविधियां वास्तव में हिंद महासागर तक पहुंचती हैं, तो शिपिंग कंपनियां सुरक्षा आकलन के आधार पर अपने रास्ते बदल सकती हैं। ऐसी स्थिति में जहाजों को लंबा रास्ता तय करना पड़ सकता है, जिससे डिलीवरी में देरी और लागत में वृद्धि संभव है।
भारत के लिए समुद्री सुरक्षा अहम
भारत के लिए यह घटनाक्रम इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि देश की ऊर्जा जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा समुद्री आयात से पूरा होता है। पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने की स्थिति में भारतीय जहाजों और नाविकों की सुरक्षा, समुद्री मार्गों की निगरानी और ऊर्जा आपूर्ति की निरंतरता अहम मुद्दे बन जाते हैं।
फिलहाल ईरान की ओर से आई चेतावनी को संघर्ष के संभावित विस्तार का संकेत माना जा रहा है। अगर अमेरिका या इजरायल की ओर से दोबारा हमला होता है और ईरान जवाब में संघर्ष का दायरा बढ़ाता है, तो इसका प्रभाव फारस की खाड़ी से लेकर लाल सागर और हिंद महासागर तक महसूस किया जा सकता है।
ऐसी स्थिति में भारत और चीन के लिए सबसे महत्वपूर्ण मुद्दे तेल की सप्लाई, समुद्री व्यापार, शिपिंग लागत और ऊर्जा कीमतें होंगे। हालांकि, अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि हिंद महासागर में भारतीय या चीनी तेल टैंकर निश्चित रूप से फंस जाएंगे। आने वाले दिनों में समुद्री यातायात और क्षेत्रीय सैन्य गतिविधियों पर नजर रखना महत्वपूर्ण होगा।
