
मुंबई:
महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर नया राजनीतिक घमासान शुरू हो गया है। राज्य में आगामी चुनावों से ठीक पहले मतदाता सूची (Voter List) के पुनरीक्षण के दौरान लाखों योग्य मतदाताओं के नाम हटाए जाने का मामला तूल पकड़ता जा रहा है। इस मुद्दे को लेकर कांग्रेस और विपक्षी दलों ने सत्तारूढ़ महायुति सरकार तथा चुनाव आयोग के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। कांग्रेस का आरोप है कि चुनावी नतीजों को प्रभावित करने की साजिश के तहत विपक्ष के प्रभाव वाले क्षेत्रों से सुनियोजित तरीके से मतदाताओं के नाम काटे गए हैं।
लाखों मतदाताओं के नाम गायब होने का दावा
कांग्रेस नेताओं के अनुसार, राज्यभर के विभिन्न विधानसभा क्षेत्रों में जमीनी समीक्षा के दौरान यह बात सामने आई है कि बिना किसी पूर्व सूचना या पारदर्शी प्रक्रिया के हजारों वैध मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से हटा दिए गए हैं। पार्टी का दावा है कि मुंबई, ठाणे, पुणे, मराठवाड़ा और विदर्भ जैसे प्रमुख क्षेत्रों में एक विशेष रणनीति के तहत यह कदम उठाया गया है।
कई स्थानों पर एक ही परिवार के सदस्यों के नाम अलग-अलग बूथों पर स्थानांतरित कर दिए गए हैं, जबकि कई पुराने व नियमित मतदाताओं को मृत या स्थानांतरित बताकर सूची से बाहर कर दिया गया है। कांग्रेस प्रतिनिधियों का कहना है कि यह केवल एक तकनीकी या प्रशासनिक चूक नहीं है, बल्कि नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों पर सीधा कुठाराघात है।
कांग्रेस का महायुति सरकार पर तीखा हमला
कांग्रेस के प्रदेश नेतृत्व ने राज्य सरकार पर तीखा प्रहार करते हुए कहा कि जनसमर्थन खो चुकी महायुति सरकार अब मतदाता सूची में फेरबदल कर चुनावी लाभ हासिल करना चाहती है। पार्टी प्रवक्ताओं ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कई आंकड़े पेश किए और इसे निष्पक्ष चुनाव प्रक्रिया के साथ खिलवाड़ करार दिया।
> *”महायुति सरकार अपनी संभावित हार से डर चुकी है, इसलिए षड्यंत्र का सहारा लिया जा रहा है। बिना किसी भौतिक सत्यापन के लाखों वैध मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाना बेहद चिंताजनक है। चुनाव आयोग को तुरंत इस पूरी प्रक्रिया पर रोक लगाकर स्वतंत्र जांच करानी चाहिए।”* — **कांग्रेस प्रदेश नेतृत्व**
मुख्य मांगें और चुनाव आयोग से हस्तक्षेप की गुहार
इस मुद्दे पर विपक्षी दलों के प्रतिनिधिमंडल ने मुख्य निर्वाचन अधिकारी से मुलाकात कर लिखित शिकायत सौंपी है। पार्टी द्वारा उठाई गई मुख्य मांगें इस प्रकार हैं:
पुनर्निवेशन और बहाली: हटाए गए सभी नामों की त्वरित जांच की जाए और सभी पात्र नागरिकों को पुनः सूची में शामिल किया जाए।
डोर-टू-डोर सत्यापन: केवल डिजिटल या कागजी डेटा के आधार पर नाम न काटे जाएं; प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा घर-घर जाकर सत्यापन कराया जाए।
पूर्व सूचना की अनिवार्यता: मतदाता सूची से नाम हटाने से पहले संबंधित व्यक्ति को लिखित नोटिस देना अनिवार्य किया जाए।
जवाबदेही तय हो: मतदाता सूची में इस प्रकार की बड़े पैमाने पर हुई गड़बड़ी के लिए जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ सख्त दंडात्मक कार्रवाई हो।
प्रशासन और सत्तारूढ़ दल का पक्ष
दूसरी ओर, चुनाव आयोग और राज्य प्रशासन का कहना है कि मतदाता सूची का पुनरीक्षण एक सतत और नियमित कानूनी प्रक्रिया है। इसके तहत दोहरे पंजीकरण, मृत मतदाताओं तथा स्थायी रूप से स्थान बदल चुके लोगों के नाम नियमों के अनुसार हटाए जाते हैं।
सत्तारूढ़ महायुति गठबंधन के नेताओं ने कांग्रेस के आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है। सत्तापक्ष का कहना है कि कांग्रेस अपनी संभावित चुनावी हार की पृष्ठभूमि तैयार कर रही है और संवैधानिक संस्थाओं की निष्पक्षता पर अकारण सवाल उठाकर जनता को भ्रमित करने का प्रयास कर रही है।
निष्कर्ष
महाराष्ट्र में मतदाता सूची से नाम कटने का यह विवाद केवल एक प्रशासनिक मुद्दा न रहकर राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील बन चुका है। नागरिकों में अपने मताधिकार को लेकर असमंजस की स्थिति बनी हुई है। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर विपक्षी दलों द्वारा आंदोलन तेज करने के संकेत मिले हैं, जिससे राज्य में चुनावी सरगर्मी और बढ़ने की उम्मीद है।
