Sunday, September 6, 2026

जाति जनगणना पर सियासी घमासान! अली अनवर ने BJP पर लगाया बड़ा आरोप

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जाति जनगणना को लेकर फिर गरमाई सियासत

देश में जाति जनगणना को लेकर राजनीतिक बहस एक बार फिर तेज हो गई है। ऑल इंडिया पसमांदा मुस्लिम महाज के अध्यक्ष और पूर्व राज्यसभा सांसद अली अनवर अंसारी ने केंद्र की BJP सरकार पर गंभीर आरोप लगाए हैं। अली अनवर का दावा है कि केंद्र सरकार इस साल होने वाली जाति जनगणना को सही तरीके से कराने के बजाय उसे “खराब” करने की कोशिश कर रही है।

अली अनवर ने रविवार को जारी एक बयान में कहा कि केंद्र सरकार ने जाति जनगणना कराने पर सहमति तो जताई है, लेकिन जिस तरह की ओपन-एंडेड प्रश्नावली तैयार की गई है, उससे उन्हें आशंका है कि इस पूरी कवायद का वही हश्र हो सकता है जो 2011 की जनगणना के जाति संबंधी आंकड़ों का हुआ था।

‘ओपन-एंडेड’ प्रश्नावली पर उठाए सवाल

अली अनवर की सबसे बड़ी आपत्ति जाति जनगणना की प्रश्नावली को लेकर है। उनका कहना है कि अगर लोगों से उनकी जाति के बारे में बिना स्पष्ट सूची के जानकारी मांगी गई, तो अलग-अलग लोग अपनी जाति या बिरादरी का नाम अलग-अलग तरीके से दर्ज कर सकते हैं।

उनके मुताबिक इससे भविष्य में आंकड़ों को व्यवस्थित करने और उनका सही विश्लेषण करने में परेशानी हो सकती है। अली अनवर ने केंद्र से मांग की है कि जाति जनगणना के लिए स्पष्ट और वैज्ञानिक प्रश्नावली तैयार की जाए, ताकि देश में अलग-अलग जातियों की वास्तविक संख्या और उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति का सही आंकड़ा सामने आ सके।

2011 की जनगणना का दिया उदाहरण

अली अनवर ने 2011 Census का उदाहरण देते हुए कहा कि उस समय भी जाति संबंधी आंकड़े जुटाए गए थे, लेकिन उन्हें उस रूप में सार्वजनिक नहीं किया गया जिसकी विभिन्न सामाजिक समूहों को उम्मीद थी।

इसी अनुभव के आधार पर उनका कहना है कि अगर इस बार भी प्रश्नावली और डेटा संग्रह की प्रक्रिया स्पष्ट नहीं हुई तो 2026 की जाति जनगणना भी अपने उद्देश्य को पूरी तरह हासिल नहीं कर पाएगी। उन्होंने केंद्र सरकार से इस मामले में पारदर्शिता और स्पष्टता सुनिश्चित करने की मांग की है।

बिहार मॉडल का दिया सुझाव

अली अनवर ने बिहार जाति आधारित सर्वेक्षण का उदाहरण देते हुए कहा कि केंद्र को उसी तरह स्पष्ट तरीके से जातियों की पहचान और उनके सामाजिक-आर्थिक हालात का आंकड़ा जुटाना चाहिए।

उनका सुझाव है कि केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा मान्यता प्राप्त जाति सूचियों को प्रश्नावली का हिस्सा बनाया जाए। उन्होंने कहा कि अनुसूचित जाति यानी SC, अनुसूचित जनजाति यानी ST, OBC और सामान्य वर्ग से जुड़े लोगों को संबंधित आधिकारिक सूचियों के आधार पर अपनी जाति दर्ज करने की सुविधा मिलनी चाहिए।

उनके अनुसार ऐसा नहीं होने पर जाति जनगणना के आंकड़ों में भ्रम पैदा हो सकता है और बाद में इन आंकड़ों का इस्तेमाल नीति निर्माण में करना मुश्किल हो सकता है।

मुस्लिम समाज के अंदर भी उठाया मुद्दा

अली अनवर ने केवल सरकार पर ही सवाल नहीं उठाया, बल्कि मुस्लिम समाज के अंदर जाति पहचान को लेकर चल रही बहस का भी जिक्र किया।

उनका आरोप है कि कुछ आरक्षण विरोधी समूह मुस्लिम समाज के लोगों के बीच यह प्रचार कर रहे हैं कि जाति के कॉलम में अपनी बिरादरी का नाम लिखने के बजाय केवल “मुसलमान” लिखा जाए। अली अनवर का कहना है कि ऐसा होने पर मुस्लिम समाज के भीतर मौजूद अलग-अलग सामाजिक और पिछड़े समूहों की वास्तविक स्थिति सामने नहीं आ पाएगी।

पसमांदा समाज के लिए क्यों महत्वपूर्ण है जाति जनगणना?

पसमांदा मुस्लिम समाज लंबे समय से सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक प्रतिनिधित्व से जुड़े मुद्दे उठाता रहा है। अली अनवर का मानना है कि जाति आधारित आंकड़े सामने आने से यह समझने में मदद मिलेगी कि अलग-अलग सामाजिक समूहों की जनसंख्या कितनी है और उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति क्या है।

उनके मुताबिक आंकड़ों के आधार पर आरक्षण, प्रतिनिधित्व और कल्याणकारी योजनाओं को अधिक प्रभावी तरीके से तैयार किया जा सकता है।

अली अनवर ने यह भी कहा कि उन्होंने दिसंबर 2009 में राज्यसभा में जाति जनगणना का मुद्दा उठाया था और पसमांदा मुस्लिम महाज लंबे समय से इस मांग को लेकर सक्रिय रहा है।

BJP पर लगाए गंभीर आरोप

अली अनवर ने अपने बयान में BJP सरकार की नीयत पर भी सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार की “मनुवादी विचारधारा” के कारण जाति जनगणना की प्रक्रिया को कमजोर करने की कोशिश हो रही है।

हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि ये अली अनवर के राजनीतिक आरोप हैं। उपलब्ध रिपोर्टों में BJP की ओर से इन विशेष आरोपों पर विस्तृत प्रतिक्रिया का उल्लेख नहीं है। इसलिए इस मामले में सरकार का आधिकारिक पक्ष सामने आने के बाद ही तस्वीर और स्पष्ट होगी।

आरक्षण विरोधी ताकतों को लेकर भी चिंता

अली अनवर ने दावा किया कि जाति जनगणना के मुद्दे पर आरक्षण विरोधी ताकतें भी सक्रिय हो गई हैं। उनके बयान के मुताबिक, कुछ ऐसे नेता और समूह जाति आधारित आंकड़ों को लेकर सवाल उठा रहे हैं।

उन्होंने केंद्र सरकार से मांग की कि जाति जनगणना को केवल आंकड़े जुटाने की प्रक्रिया न बनाया जाए, बल्कि इसके जरिए देश के अलग-अलग सामाजिक समूहों की वास्तविक स्थिति को समझने का प्रयास किया जाए।

जाति जनगणना बन सकती है बड़ा राजनीतिक मुद्दा

जाति जनगणना पिछले कुछ वर्षों में भारतीय राजनीति का एक बड़ा मुद्दा बन चुकी है। इसके समर्थकों का तर्क है कि देश में सामाजिक न्याय और सरकारी योजनाओं को प्रभावी बनाने के लिए जातिगत और सामाजिक-आर्थिक आंकड़ों की जरूरत है। वहीं, इसके विरोध में यह तर्क दिया जाता है कि जाति आधारित पहचान को बढ़ावा देने से सामाजिक विभाजन और राजनीतिक ध्रुवीकरण बढ़ सकता है।

ऐसे में अली अनवर का ताजा बयान इस बहस को और तेज कर सकता है। खासकर OBC, पसमांदा मुस्लिम और सामाजिक न्याय की राजनीति के संदर्भ में इसका राजनीतिक असर देखने को मिल सकता है।

अब केंद्र सरकार के जवाब पर नजर

फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि केंद्र सरकार जाति जनगणना की प्रश्नावली और डेटा संग्रह प्रक्रिया को लेकर उठाई गई आपत्तियों पर क्या जवाब देती है।

अली अनवर की मांग है कि जाति की पहचान के लिए आधिकारिक सूचियों को शामिल किया जाए और पूरी प्रक्रिया को स्पष्ट बनाया जाए। दूसरी ओर, सरकार की ओर से इस मुद्दे पर विस्तृत प्रतिक्रिया आने के बाद ही यह साफ होगा कि प्रश्नावली में किस तरह के बदलाव किए जा सकते हैं।

कुल मिलाकर, जाति जनगणना को लेकर शुरू हुई यह बहस आने वाले समय में और तेज होने की संभावना है। एक तरफ सामाजिक न्याय और प्रतिनिधित्व की मांग है, तो दूसरी तरफ आंकड़ों की विश्वसनीयता और प्रक्रिया की पारदर्शिता का सवाल है। ऐसे में 2026 की जाति जनगणना सिर्फ जनगणना की प्रक्रिया नहीं, बल्कि देश की सामाजिक और राजनीतिक दिशा को प्रभावित करने वाला बड़ा मुद्दा बन सकती है।

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