Monday, September 7, 2026

US-ईरान टकराव का बाजार पर बड़ा असर! तेल 90 डॉलर के पार, एशिया से भारत तक शेयर बाजार में गिरावट

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अमेरिका-ईरान संघर्ष से ग्लोबल मार्केट में बढ़ी चिंता

अमेरिका और ईरान के बीच एक बार फिर बढ़े सैन्य टकराव का असर अब वैश्विक शेयर बाजार और कच्चे तेल की कीमतों पर साफ दिखाई देने लगा है। होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास बढ़े तनाव के बाद निवेशकों में चिंता बढ़ी है और बाजार में Risk-Off Sentiment देखने को मिल रहा है।

सोमवार को अमेरिकी कार्रवाई और उसके बाद ईरान की जवाबी प्रतिक्रिया की खबरों के बीच Brent Crude की कीमत करीब 2.5 फीसदी बढ़कर लगभग 90 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई। इससे एशियाई बाजारों में दबाव बढ़ा और निवेशकों ने जोखिम वाली संपत्तियों से दूरी बनानी शुरू कर दी।

90 डॉलर के पार पहुंचा कच्चा तेल

अमेरिका-ईरान टकराव का सबसे तत्काल असर कच्चे तेल पर पड़ा है। अमेरिकी कार्रवाई के बाद बाजार में यह चिंता बढ़ी कि होर्मुज जलडमरूमध्य में सैन्य तनाव बढ़ने से तेल की सप्लाई और समुद्री परिवहन प्रभावित हो सकता है।

Brent crude करीब 2.5 फीसदी चढ़कर 90 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गया। अमेरिकी WTI crude भी लगभग 85 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर पहुंचा।

तेल बाजार के लिए सबसे बड़ा जोखिम यही है कि अगर होर्मुज में तनाव लंबे समय तक बना रहता है, तो अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा आपूर्ति पर दबाव बढ़ सकता है। होर्मुज दुनिया के प्रमुख ऊर्जा परिवहन मार्गों में से एक है और यहां किसी भी बड़ी बाधा का असर दुनिया भर में दिखाई दे सकता है।

जापान और दक्षिण कोरिया के बाजार भी प्रभावित

मध्य पूर्व की घटनाओं का असर एशियाई शेयर बाजारों पर भी देखने को मिला। सोमवार को जापान के Nikkei 225 में गिरावट दर्ज की गई, जबकि दक्षिण कोरिया का Kospi हल्की बढ़त में रहा। हांगकांग का Hang Seng भी दबाव में रहा, जबकि चीन के Shanghai Composite ने इसके विपरीत बढ़त दर्ज की।

हालांकि अलग-अलग बाजारों में प्रतिक्रिया एक जैसी नहीं रही, लेकिन निवेशकों के बीच मुख्य चिंता तेल की कीमतों, महंगाई और ब्याज दरों को लेकर बनी हुई है।

अगर कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहती हैं, तो ऊर्जा आयात करने वाले देशों में महंगाई का दबाव बढ़ सकता है। इससे केंद्रीय बैंकों के सामने ब्याज दरों में कटौती की गुंजाइश भी कम हो सकती है।

भारत के शेयर बाजार पर भी दबाव

अमेरिका-ईरान तनाव का असर भारतीय शेयर बाजार पर भी पड़ा। सोमवार को Sensex और Nifty दोनों में गिरावट दर्ज की गई।

रिपोर्ट के अनुसार Nifty 50 करीब 0.68 फीसदी गिरकर 24,011.48 के स्तर पर रहा, जबकि BSE Sensex 0.58 फीसदी गिरकर 76,824.45 पर बंद हुआ। बाजार में कमजोरी का एक बड़ा कारण बढ़ती crude prices और वैश्विक स्तर पर ब्याज दरों को लेकर बढ़ी चिंता रही।

भारतीय बाजार में 16 प्रमुख सेक्टरों में गिरावट देखने को मिली। IT index करीब 2 फीसदी नीचे रहा, जबकि small-cap और mid-cap indices में भी लगभग 1 फीसदी की कमजोरी आई।

तेल महंगा हुआ तो भारत पर क्यों पड़ेगा असर?

भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के एक बड़े हिस्से के लिए कच्चे तेल के आयात पर निर्भर है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमत बढ़ने का सीधा असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।

महंगा crude भारत के लिए import bill बढ़ा सकता है। इससे रुपये पर दबाव, महंगाई और चालू खाते के घाटे को लेकर चिंता बढ़ सकती है।

अगर तेल की कीमतें लंबे समय तक 90 डॉलर से ऊपर रहती हैं, तो इसका असर पेट्रोल-डीजल, परिवहन लागत और उद्योगों पर भी पड़ सकता है। हालांकि घरेलू ईंधन कीमतों का असर कई अन्य कारकों पर भी निर्भर करता है।

निवेशकों में बढ़ी Risk-Off भावना

अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने निवेशकों को सुरक्षित विकल्पों की तरफ देखने के लिए मजबूर किया है। जब भी किसी बड़े भू-राजनीतिक संघर्ष की आशंका बढ़ती है, तो निवेशक अक्सर जोखिम वाली संपत्तियों से पैसा निकालकर Safe Haven Assets की तरफ रुख करते हैं।

इसी वजह से वैश्विक बाजारों में शेयरों के साथ-साथ बॉन्ड यील्ड और करेंसी मार्केट में भी हलचल बढ़ी है।

इसके अलावा अमेरिका में ब्याज दरों को लेकर बढ़ती उम्मीदों ने भी बाजार की चिंता बढ़ाई है। फेडरल रिजर्व के अधिकारियों के अपेक्षाकृत सख्त रुख के बाद निवेशक अब इस बात पर नजर रख रहे हैं कि महंगाई और तेल की कीमतों के बीच अमेरिकी केंद्रीय बैंक आगे क्या कदम उठाता है।

होर्मुज संकट बना सबसे बड़ा जोखिम

पूरे घटनाक्रम में होर्मुज जलडमरूमध्य सबसे महत्वपूर्ण भूमिका में है। यह समुद्री मार्ग वैश्विक ऊर्जा व्यापार के लिए बेहद अहम है।

अमेरिकी कार्रवाई और ईरानी जवाबी हमले के बाद इस क्षेत्र में सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ी है। अगर जहाजों की आवाजाही प्रभावित होती है या तेल की सप्लाई में बड़ी बाधा आती है, तो कच्चे तेल की कीमतों में और तेज उछाल देखने को मिल सकता है।

हालांकि रिपोर्टों के मुताबिक तेल की कुछ आवाजाही फिर से बहाल हुई है, लेकिन बाजार अभी भी इस बात को लेकर चिंतित है कि स्थिति कितनी जल्दी सामान्य होती है।

आगे बाजार की दिशा क्या होगी?

अब शेयर बाजार की नजर मुख्य रूप से तीन चीजों पर रहेगी—अमेरिका-ईरान संघर्ष, कच्चे तेल की कीमत और अमेरिकी ब्याज दरों की दिशा

अगर अमेरिका और ईरान के बीच तनाव जल्द कम होता है और होर्मुज में समुद्री यातायात सामान्य होता है, तो तेल की कीमतों में राहत आ सकती है और शेयर बाजार में भी सुधार देखने को मिल सकता है।

लेकिन अगर संघर्ष लंबा खिंचता है, तो तेल की कीमतों में और तेजी, महंगाई का दबाव और ब्याज दरों को लेकर अनिश्चितता बाजारों के लिए नई चुनौती बन सकती है।

भारत के लिए चुनौती और अवसर दोनों

भारत के लिए मौजूदा स्थिति एक बड़ी आर्थिक चुनौती है, क्योंकि महंगा crude आयात बिल और महंगाई पर दबाव डाल सकता है। दूसरी तरफ, कुछ ऊर्जा और रक्षा क्षेत्र की कंपनियों को बदलते वैश्विक हालात से अलग तरह का फायदा भी मिल सकता है।

फिलहाल निवेशकों के लिए सबसे अहम बात यह है कि बाजार में भू-राजनीतिक जोखिम काफी बढ़ गया है। आने वाले दिनों में अमेरिका और ईरान के अगले कदम ही यह तय करेंगे कि तेल और शेयर बाजार में यह दबाव अस्थायी है या लंबे समय तक बना रहने वाला है।

कुल मिलाकर, US-ईरान टकराव ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि मध्य पूर्व में होने वाला सैन्य संघर्ष केवल क्षेत्रीय मामला नहीं रहता। इसका असर तेल की कीमतों से लेकर एशियाई शेयर बाजार और भारत की अर्थव्यवस्था तक पहुंच सकता है।

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