
मध्य पूर्व (मिडिल ईस्ट) में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता भू-राजनीतिक तनाव अब वैश्विक ऊर्जा बाजार के लिए एक बड़ा दुःस्वप्न बनता जा रहा है। ईरान द्वारा ‘होर्मुज की खाड़ी’ (Strait of Hormuz) से तेल की आपूर्ति रोकने और “एक बूंद तेल नहीं गुजरने देंगे” जैसी खुली धमकी के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में उथल-पुथल शुरू हो गई है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार,इस तनातनी ने दुनिया भर में ऊर्जा संकट और मुद्रास्फीति (महंगाई) की आशंका को गहरा दिया है।
ईरान की धमकी और होर्मुज की खाड़ी का संकट
होर्मुज की खाड़ी दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री तेल मार्गों में से एक है, जहां से वैश्विक कच्चे तेल के कुल निर्यात का लगभग 20% हिस्सा गुजरता है। अमेरिकी प्रतिबंधों और सैन्य दबाव के जवाब में ईरान द्वारा इस जलमार्ग को अवरुद्ध करने की चेतावनी से वैश्विक बाजार में घबराहट फैल गई है।
बाजार आंकड़ों के मुताबिक, WTI क्रूड के दाम लगातार ऊपर बने हुए हैं और अनिश्चितता के कारण इनमें भारी उछाल देखा जा रहा है। यदि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है, तो कच्चा तेल 100 डॉलर प्रति बैरल के आंकड़े को भी पार कर सकता है।
भारत पर कितना पड़ेगा असर?
भारत अपनी जरूरत का 85% से अधिक कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है। ऐसे में वैश्विक बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमतों में कोई भी बड़ी बढ़ोतरी भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए सीधे तौर पर चिंता का कारण बनती है।
* **पेट्रोल और डीजल की कीमतें:** अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल महंगा होने पर ऑयल मार्केटिंग कंपनियों (OMCs) पर मार्जिन का दबाव बढ़ता है। यदि सरकार या रिफाइनरी कंपनियां इस घाटे को खुद वहन नहीं करती हैं, तो देश में पेट्रोल-डीजल के खुदरा दामों में बढ़ोतरी की संभावना बन सकती है।
* **आयात बिल और रुपया:** कच्चे तेल के महंगे होने से भारत का विदेशी मुद्रा कोष तेजी से खर्च होता है, जिससे डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये पर दबाव बढ़ता है और रुपया कमजोर हो सकता है।
* **परिवहन और लॉजिस्टिक्स लागत:** डीजल के दाम बढ़ने से सीधे माल ढुलाई (Freight Costs) महंगी हो जाती है, जिसका असर हर छोटी-बड़ी चीज की डिलीवरी पर पड़ता है।
रसोई के बजट पर चौतरफा मार
सिर्फ ईंधन ही नहीं, इस संकट की वजह से आम आदमी की थाली पर भी असर पड़ना तय माना जा रहा है। माल ढुलाई महंगी होने और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला प्रभावित होने से देश में गेहूं, प्याज और अन्य आवश्यक खाद्य वस्तुओं के दामों में तेजी देखी जा रही है। जब परिवहन लागत बढ़ती है, तो मंडियों तक पहुंचने वाली सब्जियों और अनाज के भाव अपने आप चढ़ जाते हैं।
क्या भारत इस संकट को झेलने के लिए तैयार है?
विश्लेषण के अनुसार, भारत ने हाल के वर्षों में अपने कच्चे तेल के स्रोतों में विविधता (Diversification) लाने का काम किया है। भारत अब खाड़ी देशों के अलावा रूस और अन्य क्षेत्रों से भी कच्चा तेल खरीद रहा है, जिससे आपूर्ति पूरी तरह बाधित होने का खतरा कम रहता है। इसके अतिरिक्त, भारत के पास रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार (Strategic Petroleum Reserve) भी मौजूद हैं।
हालांकि, आपूर्ति सुचारू रहने के बावजूद वैश्विक बेंचमार्क कीमतें बढ़ने का जोखिम बना रहता है। यदि ईरान और अमेरिका के बीच कूटनीतिक रास्ते से तनाव कम नहीं हुआ, तो आने वाले दिनों में आम भारतीय उपभोक्ताओं को ईंधन और महंगाई के मोर्चे पर अतिरिक्त वित्तीय दबाव झेलना पड़ सकता है।
