
दिल्ली में जारी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को लेकर राजनीतिक बहस लगातार तेज होती जा रही है। राज्यसभा सांसद और वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए कहा है कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण की प्रक्रिया में चुनाव आयोग का काम पहले की तुलना में ज्यादा केंद्रीकृत हो गया है। सिब्बल की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है, जब SIR के तहत बड़ी संख्या में मतदाताओं को नोटिस जारी किए गए हैं।
SIR को लेकर क्या है पूरा विवाद?
दिल्ली में चुनाव आयोग की ओर से मतदाता सूची के Special Intensive Revision की प्रक्रिया चल रही है। इसका उद्देश्य मतदाता सूची में मौजूद जानकारी का सत्यापन और आवश्यक सुधार करना है। दिल्ली के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के अनुसार, करीब 31.63 लाख मतदाताओं के लिए नोटिस जनरेट किए गए हैं। ये नोटिस मुख्य तौर पर उन मामलों में जारी किए गए हैं, जहां मतदाता का रिकॉर्ड पिछली Intensive Revision की सूची से लिंक नहीं हो पाया या रिकॉर्ड में कोई विसंगति मिली।
आयोग का कहना है कि नोटिस मिलना अपने आप में मतदाता का नाम काटे जाने का मतलब नहीं है। संबंधित मतदाता को जवाब देने और जरूरी दस्तावेज उपलब्ध कराने का अवसर दिया जाएगा। किसी नाम को मतदाता सूची से हटाने से पहले सुनवाई का अवसर और उचित आदेश की प्रक्रिया जरूरी है।
कपिल सिब्बल को भी मिला SIR नोटिस
SIR को लेकर कपिल सिब्बल की आपत्ति उस समय और चर्चा में आ गई, जब उन्हें भी ‘Unmapped with Last SIR’ श्रेणी में नोटिस जारी होने की जानकारी सामने आई। सिब्बल का कहना है कि उनके पुराने मतदाता रिकॉर्ड और मौजूदा जानकारी का मिलान होने के बावजूद उन्हें नोटिस भेजा गया।
सिब्बल के मुताबिक, उन्होंने एन्यूमरेशन फॉर्म में वही जानकारी दी थी जो उनके पुराने रिकॉर्ड में दर्ज थी। उन्होंने यह भी कहा कि उनके फॉर्म पर BLO यानी Booth Level Officer के हस्ताक्षर मौजूद थे। इसके बावजूद उन्हें नोटिस मिलने पर उन्होंने चुनाव आयोग की प्रक्रिया पर सवाल उठाए।
सिब्बल ने यह भी दावा किया कि उन्हें नोटिस की फिजिकल कॉपी नहीं मिली और इसकी जानकारी उन्हें वेबसाइट के जरिए मिली। उनका कहना है कि अगर उनके जैसे व्यक्ति को रिकॉर्ड मैच होने के बावजूद ऐसी प्रक्रिया का सामना करना पड़ रहा है, तो आम मतदाता के लिए स्थिति और चुनौतीपूर्ण हो सकती है।
‘EC का काम केंद्रीकृत हो गया’
सिब्बल ने SIR की प्रक्रिया को लेकर चुनाव आयोग के कामकाज पर व्यापक सवाल उठाए। उनका तर्क है कि जब मतदाता से जुड़े महत्वपूर्ण रिकॉर्ड और नोटिस जारी करने की प्रक्रिया केंद्रीकृत सॉफ्टवेयर सिस्टम के जरिए संचालित होती है, तो डेटा में गलती होने पर उसका असर बड़ी संख्या में लोगों पर पड़ सकता है।
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, दिल्ली में SIR से जुड़े नोटिस चुनाव आयोग के ECINET सिस्टम के जरिए जनरेट किए जा रहे हैं। आयोग के मुताबिक, इन नोटिस का उद्देश्य मतदाता डेटा में मौजूद विसंगतियों को दूर करना है।
यही प्रक्रिया सिब्बल के सवालों का केंद्र बनी हुई है। उनका कहना है कि सिस्टम में किसी मतदाता का रिकॉर्ड गलत तरीके से फ्लैग होने पर संबंधित व्यक्ति को अपनी स्थिति स्पष्ट करने के लिए अतिरिक्त प्रक्रिया से गुजरना पड़ सकता है।
आम मतदाता को लेकर सिब्बल की चिंता
कपिल सिब्बल ने खास तौर पर आम मतदाताओं की स्थिति को लेकर चिंता जताई है। उनका कहना है कि हर व्यक्ति के पास पुराने दस्तावेज, डिजिटल जानकारी देखने की सुविधा या कानूनी प्रक्रिया को समझने के संसाधन नहीं होते।
उनके मुताबिक, अगर किसी सामान्य मतदाता को अपने रिकॉर्ड में किसी विसंगति के कारण नोटिस मिलता है, तो उसे समय पर जवाब देना और जरूरी दस्तावेज जमा करना जरूरी होगा। सिब्बल का कहना है कि इस पूरी प्रक्रिया में आम नागरिक के लिए स्पष्ट और आसान व्यवस्था होनी चाहिए।
यह मुद्दा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि मतदाता सूची में नाम किसी भी चुनाव में मतदान के अधिकार से सीधे जुड़ा होता है। हालांकि, चुनाव आयोग की ओर से स्पष्ट किया गया है कि नोटिस जारी होने का अर्थ स्वतः नाम हटना नहीं है और संबंधित व्यक्ति को अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जाएगा।
चुनाव आयोग ने क्या कहा?
कपिल सिब्बल के आरोपों और SIR को लेकर उठ रहे सवालों के बीच दिल्ली के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय ने प्रक्रिया को लेकर स्पष्टीकरण दिया है। आयोग के अनुसार, नोटिस उन मतदाताओं को भेजे जा रहे हैं जिनके रिकॉर्ड पिछली गहन पुनरीक्षण सूची से लिंक नहीं हो पाए या जिनके विवरण में logical discrepancies पाई गईं।
आयोग ने यह भी बताया कि नोटिस पाने वाले मतदाता अपने जवाब और आवश्यक दस्तावेज संबंधित ERO या BLO के पास जमा कर सकते हैं। अधिकारियों के अनुसार, नोटिस का निपटारा निर्धारित समयसीमा के भीतर किया जाएगा और अंतिम मतदाता सूची बाद में प्रकाशित की जाएगी।
इस तरह चुनाव आयोग और कपिल सिब्बल की ओर से SIR को लेकर अलग-अलग दृष्टिकोण सामने आए हैं। जहां आयोग इसे मतदाता डेटा को दुरुस्त करने की प्रक्रिया बता रहा है, वहीं सिब्बल इसकी कार्यप्रणाली और आम मतदाताओं पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर सवाल उठा रहे हैं।
SIR पर आगे क्या होगा?
दिल्ली में SIR की प्रक्रिया अभी पूरी नहीं हुई है। नोटिस पाने वाले मतदाताओं के पास अपने रिकॉर्ड से जुड़ी जानकारी और दस्तावेज प्रस्तुत करने का अवसर है। इसके बाद दावों और आपत्तियों के आधार पर रिकॉर्ड में आवश्यक बदलाव किए जाएंगे।
SIR को लेकर जारी राजनीतिक और कानूनी बहस आने वाले दिनों में और तेज हो सकती है। फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि मतदाता सूची को अपडेट करने की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी, सटीक और आम नागरिक के लिए आसान रहती है।
कपिल सिब्बल के बयान ने इस बहस को एक बार फिर केंद्र में ला दिया है। वहीं चुनाव आयोग की ओर से यह स्पष्ट किया गया है कि नोटिस मिलने को सीधे मतदाता का नाम हटाए जाने के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए और अंतिम निर्णय निर्धारित प्रक्रिया के तहत ही लिया जाएगा।
